घिया, तोरई, टिंडा…

बचपन में जिन सब्ज़ियों से भागते थे,
बड़े होकर वही अपने हाथों से बनाते हैं…
और फिर समझ आता है कि
मम्मी सिर्फ सब्ज़ी नहीं बना रही थीं,
वो हमारी सेहत, आदतें और भविष्य पकाती थीं।

घिया, तोरई, टिंडा…
नाम सुनते ही मेरा मुंह बन जाता था।
मम्मी लाख समझातीं,
पापा प्यार से मनाते,
पर मैं उनकी लाडली बेटी,
ज़िद पर अड़ी रहती थी।

तब लगता था —
“इतनी सारी अच्छी चीज़ें हैं दुनिया में,
ये फीकी सब्ज़ियाँ ही क्यों?”

और आज…
खुद रसोई में खड़ी होकर
वही सब्ज़ियाँ बनाती हूँ।
धीरे-धीरे मसाले डालते हुए
अचानक मम्मी याद आ जाती हैं।

फिर अपने बच्चों को बुलाती हूँ —
“बस थोड़ा सा खा लो…”

और सामने से वही चेहरे,
वही नखरे,
वही बहाने…

तब हँसी भी आती है
और मम्मी की मेहनत समझ भी आती है।

ज़िंदगी सच में गोल चक्कर है…
हम बड़े होकर
धीरे-धीरे अपने माता-पिता जैसे ही हो जाते हैं।

Kitchen Tales & Cooking Joy

Replies (3)

Good one. I am also on the same side. bade hokar sab samajh aane lagta hai par fir bache unhe kaise samjhaye yahi samajh nahi aata bas. 😑😎

ye to bilkul sahi kaha. ab jakar ye sari sabziyan pasand aane lagi hain. pahle pata nahi kyo pasand nahi thi. bache bhi bade hokar shayad khane lagein. tab tak koshish karte hain jaise hamare parent ne ki thi...😊

sahi mein...