आज मोबाइल पर रील देखते-देखते एक ऐसी कहानी सामने आ गई, जिसने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया।
हम आज अपने बच्चों के सपने पूरे करने के लिए दिन-रात मेहनत कर रहे हैं।
हमें नहीं पता कि कल हमारे बच्चे हमारे लिए कितना समय निकालेंगे…
लेकिन हमें यह ज़रूर पता है कि **हम अपनी तरफ़ से कोई कमी नहीं छोड़ना चाहते।**
अच्छी पढ़ाई मिले, अच्छा भविष्य मिले, अच्छी ज़िंदगी मिले…
इसके लिए माता-पिता अपनी कितनी इच्छाएँ कुर्बान कर देते हैं।
उस पिता ने भी शायद यही किया होगा।
उनके दो बेटे थे। दोनों विदेश में रहते थे और बहुत पैसे वाले थे।
लेकिन पिता अपनी ज़िंदगी के आख़िरी दिनों में एक वृद्धाश्रम में थे।
फिर एक दिन उनका निधन हो गया।
वृद्धाश्रम के संचालक ने बड़े बेटे को फोन किया…
उसने फोन तक नहीं उठाया।
छोटे बेटे ने फोन उठाया तो उसे बताया गया आपके पिता अब नहीं रहे। अंतिम संस्कार के लिए आप कब तक आ पाएँगे? हम आपका इंतज़ार कर रहे हैं।
बेटे ने जवाब दिया मेरे पास समय नहीं है। मैं ₹5100 भेज देता हूँ, आप लोग सब कर दीजिएगा। पैसे और चाहिए हों तो बता देना।
संचालक ने कहा कम से कम वीडियो कॉल पर तो आ जाइए…
लेकिन वह बेटा वहाँ भी ज़्यादा देर रुककर अपने पिता को आख़िरी बार देख नहीं पाया…
और फोन काट दिया।
वृद्धाश्रम के लोगों ने उसके भेजे हुए पैसे वापस कर दिए और कहा—
इनका सब कुछ हम करेंगे…
क्योंकि ये हमारे लिए सिर्फ़ एक बुज़ुर्ग नहीं, हमारे अपने थे।
उस दिन शायद उस पिता को पैसों की नहीं…
अपने बच्चों की ज़रूरत थी।
इसलिए बच्चों को सिर्फ़ पढ़ाई, पैसा और कामयाबी मत दीजिए…
उन्हें यह भी सिखाइए कि
माँ-बाप की ज़िंदगी में उनकी सबसे बड़ी ज़रूरत उनका समय और उनका साथ होता है।
क्योंकि एक दिन पैसा बहुत होगा…
लेकिन हो सकता है माँ-बाप न हों।
अपने माता-पिता के पास बैठ जाइए…
जब तक उनके पास बैठने का समय आपके पास है।