नेहा एक बहुत ही प्यारी और जिम्मेदार माँ थी। उसका बेटा आरव उसकी पूरी दुनिया था। नेहा हमेशा चाहती थी कि आरव हर चीज़ में सबसे आगे रहे — पढ़ाई में, खेल में, हर जगह।
एक दिन आरव स्कूल से थोड़ा उदास घर आया।
नेहा ने पूछा, “क्या हुआ बेटा?”
आरव धीरे से बोला, “मम्मा, आज मेरा टेस्ट अच्छा नहीं गया…”
नेहा तुरंत गुस्से में बोली,
“इतनी बार कहा है ध्यान से पढ़ाई करो! देखो शर्मा जी का बेटा हर बार टॉप करता है!”
आरव चुप हो गया। उसने कुछ नहीं कहा… बस अपने कमरे में चला गया।
ये एक दिन की बात नहीं थी। हर छोटी गलती पर नेहा उसे डाँट देती, दूसरों से तुलना करती।
धीरे-धीरे आरव ने अपनी बातें शेयर करना बंद कर दिया।
वो पढ़ाई तो करता था, लेकिन डर के साथ… खुशी से नहीं।
साल बीत गए…
आरव बड़ा हो गया, लेकिन अब वो अपनी माँ से खुलकर बात नहीं करता था।
एक दिन नेहा ने महसूस किया कि उसका बेटा उससे दूर हो गया है।
वो बोली, “आरव, तुम मुझसे बात क्यों नहीं करते?”
आरव की आँखों में आँसू आ गए…
वो बोला,
“मम्मा, जब भी मैं कुछ बताने आता था, आप मुझे समझने के बजाय डाँट देती थीं…
मैंने सोचा, शायद मेरी बातें जरूरी ही नहीं हैं…”
नेहा के पास कोई जवाब नहीं था।
उसे अपनी वो छोटी-छोटी गलतियाँ याद आने लगीं, जो आज एक बड़ी दूरी बन चुकी थीं।
उसने आरव का हाथ पकड़ा और कहा,
“मुझे माफ कर दो बेटा… मैंने तुम्हें समझने से ज्यादा तुम्हें बदलने की कोशिश की…”
आरव ने हल्की सी मुस्कान के साथ माँ को गले लगा लिया।
दूरी तो पूरी तरह खत्म नहीं हुई, लेकिन एक नई शुरुआत जरूर हो गई।
सीख:
बच्चों को परफेक्ट बनाने से पहले उन्हें समझना जरूरी है…
क्योंकि बचपन की छोटी-छोटी बातें ही रिश्तों की सबसे मजबूत या सबसे कमजोर नींव बनाती हैं।
एक छोटी गलती, बड़ा असर
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