राधिका एक हाउसवाइफ थी।
उसका घर खुशियों से भरा था—प्यार करने वाला पति, प्यारे बच्चे, और एक सजा-संवरा घर।
सब कुछ परफेक्ट था…
बस एक चीज़ अधूरी थी—उसका सपना।
राधिका बचपन से ही एक आर्टिस्ट बनना चाहती थी।
रंगों से खेलना, कैनवास पर अपनी भावनाएँ उतारना—यही उसकी असली खुशी थी।
लेकिन शादी के बाद…
उसके हाथों में ब्रश की जगह बेलन आ गया,
और कैनवास की जगह किचन की दीवारें।
धीरे-धीरे उसने अपने सपनों को दिल के किसी कोने में बंद कर दिया।
एक दिन, उसकी बेटी स्कूल से एक ड्रॉइंग लेकर आई और बोली—
“मम्मी, टीचर ने कहा है कि आप बहुत अच्छा ड्रॉ करती हो… आप क्यों नहीं बनाती अब?”
राधिका कुछ पल के लिए चुप रह गई…
उसने आईने में खुद को देखा—
और पहली बार महसूस किया कि वो खुद से ही दूर हो गई है।
उसी रात, जब सब सो गए…
राधिका ने अलमारी से अपने पुराने रंग और ब्रश निकाले।
हाथ कांप रहे थे…
लेकिन दिल में एक अजीब सी खुशी थी।
उसने फिर से पेंटिंग शुरू की।
शुरुआत में सबको ये बस एक शौक लगा…
लेकिन धीरे-धीरे उसकी पेंटिंग्स में जान दिखने लगी।
उसने सोशल मीडिया पर अपनी आर्ट शेयर की…
लोगों को पसंद आने लगी…
ऑर्डर मिलने लगे।
और एक दिन…
वो राधिका, जो सिर्फ “हाउसवाइफ” कहलाती थी—
अब एक पहचानी हुई आर्टिस्ट बन चुकी थी।
घर वही था… लोग वही थे…
लेकिन अब राधिका बदल चुकी थी।
उसने समझ लिया था—
सपने उम्र या जिम्मेदारियों से नहीं रुकते…
बस हम उन्हें रोक देते हैं।